SHANTI/शांति



My published poem SHANTI, written in English and shared here by yours truly, was actually first composed in my native tongue Hindi. That’s the pattern with many of my poems, to be bilingual and maintain the felicity and flow of expression.

Hence, I am sharing the original Hindi version here for all those who read and speak the language.

I hope it’s as fruitful an experience for all as the English version was.


The English version of my poem published few days ago.








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हे राम, घोर कलयुग आ गया
अब तो शिव ने भी स्वयं
अपना देह संस्कार कर दिया।
कर अपनी भुजाओ को त्याग
और ले आत्मा से परम निर्वाण,
बहा दी अपनी छवी विशाल महासागर में

कोई कहे की ये एक प्रतिमा है,
एक तस्वीर संसार का,
पर कौन सा संसार रहा अपने समक्ष
जब खुद भोलेनाथ बिना तांडव किए
या अपने केश खोले,
विलेन कर चले खुद को
अपने ही आशरु से उत्तपन हुए सागर में

शीतल चेहरे पे मत जाओ,
वो तो देह और माया से सदा ऊपर था।
देखो तो ये असीम त्याग,
देखो परिंदे की व्यथा,
जो देवभूमि पर देख रहा है
भ्रामंड के रचयता को
आज निर्जीव
मृत
जैसे जीवन और मृत्यु
से कोई सरोकार नहीं

कोई कहे है वो कृष्णा,
है वो विष्णु,
है वो दुर्गा,
है वो काली का एक रूप।
कोई कहे है वो मेरा बेटा,
मेरा बच्चा,
जिसे जीवन धरा ने अपने में समा लिया
और रह गया तो मातृ उसका चेहरा।

जैसे खुद धरती सो गई हो
और संसार खो गया हो
इस काले स्वप्न के नगर में

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